केवल भारत की 140 करोड़ आबादी के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया की 840 करोड़ आबादी के लिए एक नया जलवायु शिक्षा मॉडल विकसित करने की दिशा में बंगाल के जलवायु पत्रकार सौविक चोंगदर पहल कर रहे हैं।
हावड़ा जिले से अपने पेशेवर सफर की शुरुआत करने वाले सौविक चोंगदर जलवायु पत्रकारिता और जलवायु संचार के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2023 में उन्होंने सुंदरबन के 20 स्कूली विद्यार्थियों के साथ जलवायु शिक्षा के एक प्रायोगिक मॉडल की शुरुआत की। इसके बाद 2024 में अजरबैजान के बाकू में आयोजित वैश्विक जलवायु सम्मेलन के मंच पर उन्होंने इस मॉडल के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया। उनका कार्य केवल भारत तक सीमित नहीं रहा; ऑनलाइन माध्यमों के जरिए उन्होंने अफ्रीका के सूडान और जिम्बाब्वे के स्कूली विद्यार्थियों के साथ भी इस मॉडल पर काम किया है।
सौविक द्वारा विकसित जलवायु शिक्षा मॉडल मुख्य रूप से दो प्रमुख ढाँचों पर आधारित है। पहला ढाँचा ज्ञान और जागरूकता-आधारित शिक्षा प्रणाली है, जिसमें छह अलग-अलग मार्गों के माध्यम से विद्यार्थियों को जलवायु संबंधी ज्ञान, स्थानीय जलवायु जोखिमों को समझने की क्षमता और भविष्य के लिए तैयारी से जोड़ा जाता है। इस ढाँचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा “Climate Gatekeeper” की अवधारणा है, जिसके माध्यम से विद्यार्थी अपने परिवार, विद्यालय और व्यापक समुदाय में जलवायु जागरूकता के संदेशवाहक बन सकते हैं।
दूसरे ढाँचे में छह विश्लेषणात्मक और कार्यान्वयन-आधारित मार्ग शामिल हैं। इसमें विद्यालयों में अनिवार्य Climate Lab की स्थापना, विद्यार्थियों और अनुभवी एवं बुजुर्ग समुदाय के सदस्यों के बीच ज्ञान का आदान-प्रदान तथा जलवायु संचार के माध्यम के रूप में Community Radio के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है। हालांकि, इस मॉडल की सबसे अभिनव अवधारणाओं में से एक है Climate Gaming
Climate Gaming
सौविक के अनुसार, Climate Gaming का अर्थ केवल आधुनिक तकनीक, वर्चुअल रियलिटी या महंगे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करना नहीं है। इसके बजाय, यह पद्धति आसानी से उपलब्ध स्थानीय सामग्रियों, स्थानीय ज्ञान, सामूहिक खेलों, परिस्थिति-आधारित अभ्यासों और वास्तविक जीवन के अनुभवों का उपयोग करती है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को यह सिखाना है कि जलवायु संबंधी आपदाओं के आने से पहले किस प्रकार तैयारी की जाए और आपातकालीन परिस्थितियों के दौरान सही निर्णय कैसे लिया जाए।
इस मॉडल का उद्देश्य केवल जलवायु परिवर्तन के बारे में जानकारी प्रदान करना नहीं है। बल्कि इसका लक्ष्य बच्चों और किशोर-किशोरियों को ज्ञान से निर्णय लेने, निर्णय से तैयारी और तैयारी से जलवायु कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ाना है।
सौविक का कहना है कि यह मॉडल हाल ही में यूरोप के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े जलवायु शिक्षा क्षेत्र तक पहुंचा है। उनका यह भी कहना है कि 21 देशों के प्रतिनिधि वर्ष 2030 तक इस मॉडल की प्रगति और संभावित उपयोग पर नजर रखेंगे। उनके अनुसार, इस मॉडल को संयुक्त राष्ट्र के संबंधित जलवायु परिवर्तन ढाँचे में प्रस्तुति के लिए भी पहुंचाया गया है।
भावी पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए एक सामाजिक व्यवस्था
सौविक चोंगदर कहते हैं, “जलवायु शिक्षा केवल एक विषय नहीं है; यह भावी पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए एक सामाजिक व्यवस्था है। यदि सुंदरबन जैसे जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र से शुरू हुई यह सीख द्वीपों, तटीय क्षेत्रों, रेगिस्तानों, पर्वतीय क्षेत्रों और बाढ़-प्रवण इलाकों में रहने वाले बच्चों तक पहुंचाई जा सके, तो जलवायु शिक्षा को एक वैश्विक जनआंदोलन में बदला जा सकता है।”
उन्होंने आगे बताया कि कल इस्तांबुल के Climate Champions के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के प्रतिनिधियों के साथ भी चर्चा निर्धारित है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों और क्षेत्रों की स्थानीय आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार इस मॉडल को अनुकूलित करना और दुनिया के अधिक से अधिक विद्यालयों तक पहुंचाना है।
स्थानीय अनुभवों से वैश्विक समाधान
बंगाल के सुंदरबन से शुरू हुई यह पहल यदि अब दुनिया के द्वीपों और तटीय समुदायों के बच्चों तक पहुंचती है, तो यह जलवायु शिक्षा के क्षेत्र में इस बात का एक नया उदाहरण बन सकती है कि स्थानीय अनुभवों से वैश्विक समाधान कैसे विकसित किए जा सकते हैं।





























