लेकिन यात्रियों को जमीनी स्तर पर हो रही परेशानी
कोलकाता : कोलकाता मेट्रो में शौचालयों की उपलब्धता और यात्रियों की वास्तविक सुविधा को लेकर दायर एक आरटीआई के जवाब ने सार्वजनिक सुविधाओं की स्थिति पर नए सवाल खड़े किए हैं। अधिवक्ता आकाश शर्मा द्वारा दायर आरटीआई के जवाब में मेट्रो रेलवे कोलकाता ने दावा किया है कि उसके सभी स्टेशनों पर शौचालय उपलब्ध हैं और उनका उपयोग कर्मचारी तथा यात्री दोनों कर सकते हैं।
28 अक्टूबर 2026 को जारी जवाब में मेट्रो रेलवे ने यह भी कहा है कि सभी शौचालय चालू हालत में हैं और ऐसा कोई स्टेशन नहीं है जहां शौचालय की सुविधा उपलब्ध न हो।
आरटीआई में क्या जानकारी मांगी गई थी ?
आरटीआई के माध्यम से सभी मेट्रो लाइनों के स्टेशनों पर शौचालयों की उपलब्धता, उनके चालू या बंद होने की स्थिति, पुरुषों, महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए अलग सुविधाओं, उपयोग शुल्क, कर्मचारियों के शौचालयों के यात्रियों द्वारा उपयोग तथा निरीक्षण रिपोर्टों की जानकारी मांगी गई थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पूर्व कार्रवाई से संबंधित दस्तावेज भी मांगे गए थे।
छह स्टेशनों पर पे एंड यूज शौचालय
मेट्रो रेलवे के अनुसार, छह स्टेशनों पर पे एंड यूज शौचालय संचालित हैं। इनमें ब्लू लाइन के दक्षिणेश्वर और बरानगर तथा ग्रीन लाइन के हावड़ा, सॉल्ट लेक सेक्टर V, एस्प्लेनेड और सियालदह शामिल हैं।
जवाब के अनुसार, यूरिनल के उपयोग के लिए 2 रुपये और शौचालय के उपयोग के लिए 5 रुपये शुल्क लिया जाता है। इसके समर्थन में रेलवे बोर्ड का 14 जून 2022 का पत्र तथा मानक संविदात्मक शर्तें भी उपलब्ध कराई गई हैं।
कागजों पर सुविधा और वास्तविक उपलब्धता के बीच सवाल
मेट्रो रेलवे के दावे के बावजूद कई यात्रियों ने विभिन्न स्टेशनों पर शौचालय खोजने या उनका उपयोग करने में कठिनाई होने की शिकायत की है। यात्रियों के सामने प्रमुख सवाल यह है कि क्या शौचालय आसानी से दिखाई देते हैं, क्या वे यात्रियों के लिए वास्तव में सुलभ हैं और क्या जरूरत पड़ने पर उनका उपयोग बिना किसी विशेष अनुमति के किया जा सकता है।
आरटीआई के जवाब में स्टेशनवार निरीक्षण रिपोर्ट या परिचालन संबंधी आकलन उपलब्ध नहीं कराया गया। संबंधित कार्यालय ने कहा कि ऐसी कोई रिपोर्ट उसके पास उपलब्ध नहीं है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संबंध में भी जवाब में कहा गया कि संबंधित कार्यालय को इस विषय में कोई मामला या शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि रेलवे के अन्य कार्यालयों, रेलवे बोर्ड या आयोग के पास ऐसे दस्तावेज मौजूद नहीं हैं।
मानवाधिकार आयोग की पूर्व कार्रवाई फिर चर्चा में पूर्व में प्रकाशित समाचार रिपोर्टों के अनुसार, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स ने वर्ष 2014 में कोलकाता मेट्रो यात्रियों के लिए शौचालयों की अनुपलब्धता का मुद्दा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया था। वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट में आयोग द्वारा रेलवे बोर्ड से इस समस्या पर कार्रवाई करने को कहे जाने का उल्लेख है।
वर्ष 2018 की समाचार रिपोर्टों ने शहीद खुदीराम और नोआपाड़ा मेट्रो स्टेशनों पर शौचालय निर्माण को आयोग की पूर्व कार्रवाई से जोड़ा था।
अधिवक्ता आकाश शर्मा ने उठाई पारदर्शिता की मांग
अधिवक्ता आकाश शर्मा का कहना है कि आरटीआई का उद्देश्य एक बुनियादी सार्वजनिक सुविधा की वास्तविक स्थिति को सामने लाना है। केवल सरकारी रिकॉर्ड में शौचालय का उल्लेख होना पर्याप्त नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आम यात्री उसे ढूंढ सकता है या नहीं और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग कर सकता है या नहीं।
अधिवक्ता आकाश शर्मा इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का रुख कर सकते हैं। उनका संभावित पक्ष होगा कि यात्रियों को बुनियादी शौचालय सुविधाओं तक पहुंचने में होने वाली कठिनाइयां गंभीर मानवाधिकार संबंधी चिंताएं पैदा करती हैं। इसका विशेष प्रभाव महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांगजनों की गरिमा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण पर पड़ सकता है। आवश्यकता के समय उपयोग योग्य शौचालय उपलब्ध न होना केवल असुविधा का विषय नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार यह यात्रियों की गरिमा, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है। शर्मा आयोग से मेट्रो स्टेशनों पर शौचालयों की वास्तविक उपलब्धता और सुलभता की स्वतंत्र जांच, स्टेशनवार निरीक्षण तथा सुरक्षित, स्वच्छ और चालू शौचालय सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए उचित सिफारिशों की मांग कर सकते हैं। यह प्रस्तावित कार्रवाई आयोग के निष्कर्षों को पहले से निर्धारित किए बिना जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जा सकती है।































