‘सबुज मंच’ ने पर्यावरण मंत्री को लिखा पत्र
कोलकाता : काली पूजा और दीपावली से पहले पश्चिम बंगाल में ध्वनि और वायु प्रदूषण पर नियंत्रण को लेकर पर्यावरण संगठन ‘सबुज मंच’ ने राज्य सरकार से कड़े कदम उठाने की मांग की है। संगठन ने इस संबंध में राज्य के पर्यावरण एवं वन मंत्री मनोज कुमार उरांव को पत्र लिखकर पटाखों, तेज आवाज वाले डीजे, लाउडस्पीकर और वाहनों के अवैध हॉर्न पर प्रभावी नियंत्रण की अपील की है। यह पत्र संगठन के महासचिव नब दत्त ने लिखा है।
पत्र में संगठन ने दुर्गा पूजा के दौरान ध्वनि प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए प्रशासन की ओर से उठाए गए कदमों की सराहना की है। हालांकि, उसका कहना है कि कई इलाकों में अब भी नियमों का उल्लंघन हो रहा है। संगठन ने त्योहारों के दौरान प्रदूषण रोकने के लिए पहले से स्पष्ट योजना बनाने और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है।
डीजे और लाउडस्पीकर पर नियंत्रण की मांग
सबुज मंच के अनुसार, दुर्गा पूजा 2026 के दौरान प्रशासन ने डीजे पर रोक लगाने और रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए थे। संगठन ने इसके लिए प्रशासन को धन्यवाद दिया, लेकिन साथ ही दावा किया कि राज्य के कई हिस्सों में तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम और भारी बास वाले डीजे अब भी लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं।
पत्र में लाउडस्पीकर पर अनिवार्य रूप से साउंड लिमिटर लगाने और निर्धारित ध्वनि सीमा का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है। संगठन का आरोप है कि कई मामलों में पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई नहीं करती और लोगों को शिकायत दर्ज कराने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उसका कहना है कि शिकायत करने में असहजता या डर के कारण कई लोग सामने नहीं आते।
पटाखा उद्योग की श्रेणी पर पुनर्विचार की मांग
संगठन ने पटाखा निर्माण उद्योग की पर्यावरणीय श्रेणी को लेकर भी सवाल उठाए हैं। पत्र में आरोप लगाया गया है कि पिछली सरकार के कार्यकाल में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पटाखा उत्पादन उद्योग को ‘रेड कैटेगरी’ से हटाकर ‘व्हाइट कैटेगरी’ में शामिल किया था, जिससे नियंत्रण कमजोर हुआ।
सबुज मंच ने इस फैसले की समीक्षा करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि ध्वनि पैदा करने वाले पटाखे और आतिशबाजी दोनों ही पर्यावरण तथा लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। घनी आबादी वाले इलाकों और पहले से वायु प्रदूषण की समस्या झेल रहे शहरों में इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।
पत्र में गर्भवती महिलाओं, गर्भस्थ शिशुओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों पर संभावित दुष्प्रभावों का उल्लेख किया गया है। संगठन ने यह भी कहा है कि पटाखों की तेज आवाज से पालतू जानवरों, पक्षियों और वन्यजीवों में डर पैदा हो सकता है तथा विद्यार्थियों की पढ़ाई और एकाग्रता प्रभावित हो सकती है।
125 नहीं, 90 डेसिबल की सीमा लागू करने की अपील
सबुज मंच ने पटाखों की ध्वनि सीमा को लेकर भी सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में 125 डेसिबल की सीमा का उल्लेख रहा है, लेकिन राज्यों को इससे अधिक सख्त मानक तय करने का अधिकार है।
संगठन का दावा है कि पश्चिम बंगाल में पहले विशेषज्ञों की सलाह पर 90 डेसिबल की सीमा लागू थी, जिसे पिछले दो वर्षों में बदल दिया गया। उसने राज्य सरकार से इस सीमा को दोबारा लागू करने की अपील की है।
हालांकि, ध्वनि सीमा और पटाखों से जुड़े नियमों के सटीक कानूनी प्रावधानों की पुष्टि संबंधित सरकारी आदेशों और न्यायिक निर्देशों के आधार पर की जानी चाहिए।
ऑनलाइन पटाखा बिक्री पर रोक लगाने की मांग
पत्र में ऑनलाइन माध्यम से पटाखों की बिक्री को लेकर भी चिंता जताई गई है। संगठन का कहना है कि इंटरनेट के जरिए पटाखों का कारोबार बढ़ रहा है और इसकी निगरानी प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रही है।
सबुज मंच ने ऑनलाइन पटाखा बिक्री पर तत्काल रोक लगाने और बिक्री से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया पर निगरानी बढ़ाने की मांग की है। संगठन के अनुसार, नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए केवल अपील करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी जरूरी है।
पटाखे जलाने के समय का पालन सुनिश्चित करने की अपील
संगठन ने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप पटाखे जलाने के समय का पालन कराने पर विशेष जोर दिया है। पत्र के अनुसार, काली पूजा और दीपावली की रात 8 से 10 बजे, छठ पूजा के दौरान सुबह 6 से 8 बजे तथा वर्ष के अंतिम दिन रात 11:55 बजे से अगले दिन रात 12:30 बजे तक पटाखे जलाने की समय सीमा का पालन कराया जाना चाहिए।
सबुज मंच ने पुलिस प्रशासन से त्योहारों के दौरान विशेष निगरानी रखने और निर्धारित समय के बाहर पटाखे जलाने पर रोक सुनिश्चित करने की मांग की है। इसके अलावा अस्पतालों सहित अन्य शांत क्षेत्र यानी साइलेंस जोन में नियमों के अनुसार पटाखों पर प्रतिबंध लागू कराने, उल्लंघन करने वाले विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की अपील की गई है।
वाहनों के तेज हॉर्न पर भी कार्रवाई की मांग
ध्वनि प्रदूषण के एक अन्य प्रमुख कारण के रूप में संगठन ने वाहनों के हॉर्न का मुद्दा उठाया है। पत्र में आरोप लगाया गया है कि कोलकाता समेत शहरी और ग्रामीण इलाकों में कई बसों, ट्रकों और अन्य वाहनों में निर्धारित मानकों के विपरीत तेज आवाज वाले इलेक्ट्रिक हॉर्न का इस्तेमाल किया जा रहा है।
सबुज मंच ने ऐसे हॉर्न के खिलाफ नियमित जांच और कार्रवाई की मांग की है। संगठन का कहना है कि त्योहारों के दौरान पटाखों पर नियंत्रण के साथ-साथ रोजमर्रा के ध्वनि प्रदूषण के स्रोतों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
अब देखना होगा कि राज्य सरकार और संबंधित विभाग काली पूजा-दीपावली से पहले संगठन की मांगों पर क्या कदम उठाते हैं।
































