जोड़ा फूल और ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम फ्रीज़ होने के बाद दोनों गुटों ने मांगे नए नाम-चिह्न; सुवेंदु ने कहा- इसमें बीजेपी की कोई भूमिका नहीं
कोलकाता : तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी राजनीतिक खींचतान अब चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम तक पहुंच गई है। कालीघाट खेमे और ऋतब्रत बंद्योपाध्याय गुट के बीच विवाद के बाद चुनाव आयोग ने ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न और ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम को फिलहाल फ्रीज़ कर दिया है। पार्टी के फंड और उसके वास्तविक अधिकार को लेकर स्थिति स्पष्ट होने तक चुनाव चिह्न आयोग की निगरानी में रहेगा। इसके बाद दोनों गुटों ने वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न के लिए आयोग का दरवाजा खटखटाया है।
तृणमूल के इस संकट पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने पूरे घटनाक्रम को ‘अहंकार का परिणाम’ बताते हुए इसे धार्मिक संदर्भ से भी जोड़ा।
शुक्रवार को पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए सुवेंदु ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले में बीजेपी की कोई सीधी भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा कि आयोग ने सभी पक्षों की बात सुनने के बाद नियमों के अनुसार कार्रवाई की है। उनके मुताबिक, अगर कोई पार्टी दो, तीन या चार गुटों में बंटती है, तो इसकी जिम्मेदारी उस पार्टी के नेतृत्व की है।
मुख्यमंत्री ने चुनाव परिणाम वाली रात का जिक्र करते हुए दावा किया कि उन्होंने हल्दिया से ही तृणमूल की हार का अनुमान लगा लिया था। इसके बाद उन्होंने ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए संस्कृत की पंक्ति “ अति दर्पे हता लंका, अति माने च कौरवाः ” का उल्लेख किया। उनका कहना था कि अत्यधिक अहंकार का अंत विनाश के रूप में होता है।
सुवेंदु ने तृणमूल के पुराने राजनीतिक बयानों और धार्मिक मुद्दों पर उसके रुख को भी मौजूदा संकट से जोड़ते हुए कई आरोप लगाए। उन्होंने हिंदू धर्म, महाकुंभ और राम मंदिर से जुड़े कथित बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि तृणमूल को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने इसे भगवान रामचंद्र के ‘श्राप’ से भी जोड़कर टिप्पणी की।
कालीघाट खेमे ने मांगे बैट और फुटबॉल खिलाड़ी के प्रतीक
इधर, पार्टी के नए चुनाव चिह्न को लेकर भी दोनों खेमों ने अपनी-अपनी पसंद आयोग को बताई है। कालीघाट खेमे की ओर से कथित तौर पर ‘बैट’ और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ जैसे दो विकल्प दिए गए हैं। दोनों प्रतीक चुनाव आयोग की मुक्त प्रतीकों की सूची में शामिल बताए जा रहे हैं।
इन दोनों प्रतीकों को लेकर राजनीतिक चर्चा भी तेज हो गई है। इसकी वजह यह है कि तृणमूल के राजनीतिक अभियान में लंबे समय से ‘खेला होबे’ नारा प्रमुख रहा है। ऐसे में खेल से जुड़े प्रतीकों का चुनाव राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय बन गया है।
ऋतब्रत गुट ने भी सुझाए तीन नाम और तीन प्रतीक
दूसरी ओर, ऋतब्रत बंद्योपाध्याय गुट भी पार्टी के नाम से ‘तृणमूल’ शब्द हटाने के पक्ष में नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, इस गुट ने चुनाव आयोग के सामने तीन वैकल्पिक नाम प्रस्तावित किए हैं—‘गणतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस’, ‘जातीयतावादी तृणमूल कांग्रेस’ और ‘पश्चिम बंगाल तृणमूल कांग्रेस’।
चुनाव चिह्न के लिए इस गुट ने तीन विकल्प सुझाए हैं। इनमें लिफाफा पहली पसंद, बैटरी टॉर्च दूसरी पसंद और पेंसिल बॉक्स तीसरी पसंद बताई जा रही है।
फिलहाल दोनों गुटों की ओर से दिए गए नाम और चुनाव चिह्न के विकल्पों पर अंतिम फैसला चुनाव आयोग को करना है। इस विवाद ने तृणमूल की संगठनात्मक स्थिति और पार्टी की चुनावी पहचान को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू कर दी है।
































