‘ पूरे सिस्टम का मजाक बना रहे हैं ! ’
नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में स्वर्ण कारोबारी के अपहरण और हत्या के मामले में आरोपी राजगंज के पूर्व बीडीओ प्रशांत बर्मन को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। कलकत्ता हाई कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने के निर्देश का पालन नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। मंगलवार को न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने प्रशांत की याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार से भी सवाल किए।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि एक व्यक्ति पूरी व्यवस्था का मजाक बना रहा है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक आवश्यक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। पीठ ने राज्य को हाई कोर्ट के निर्देश के अनुसार तत्काल कदम उठाने को कहा।
सरेंडर के आदेश के बावजूद पुलिस की गिरफ्त से बाहर
कलकत्ता हाई कोर्ट ने प्रशांत बर्मन को पिछले गुरुवार तक आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। लेकिन निर्धारित समय सीमा के भीतर उन्होंने सरेंडर नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उनकी ओर से पेश वकील से पूछा कि आखिर उनके मुवक्किल ने अब तक आत्मसमर्पण क्यों नहीं किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह हाई कोर्ट के निर्देश में हस्तक्षेप करने के लिए तैयार नहीं है।
अदालत ने राज्य सरकार से भी पूछा कि जब आत्मसमर्पण का आदेश दिया जा चुका है, तो उसे लागू करने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए गए।
संपत्ति जब्त करने और वेतन रोकने का भी दिया गया था आदेश
इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे की पीठ ने प्रशांत बर्मन को 48 घंटे के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। अदालत ने चेतावनी दी थी कि ऐसा नहीं करने पर उनकी संपत्तियां जब्त की जा सकती हैं।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को उनका वेतन तत्काल रोकने का निर्देश भी दिया था। साथ ही कहा था कि आत्मसमर्पण की समय सीमा समाप्त होने के बाद उनकी संपत्तियों की सूची तैयार की जाए।
इसके बावजूद प्रशांत के आत्मसमर्पण नहीं करने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। शीर्ष अदालत ने भी राज्य की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए हाई कोर्ट के निर्देश का पालन करने को कहा।
स्वर्ण कारोबारी स्वपन कामिल्या की हत्या से जुड़ा है मामला
प्रशांत बर्मन का नाम पिछले साल विधाननगर के दत्ताबाद इलाके के स्वर्ण कारोबारी स्वपन कामिल्या के अपहरण और हत्या के मामले में सामने आया था। उस समय वह राजगंज के प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) थे।
जुलाई में इस मामले की जांच सीआईडी को सौंपी गई थी। हालांकि, जांच एजेंसी प्रशांत को गिरफ्तार नहीं कर सकी। इस बीच उनके वेतन लेते रहने का मुद्दा भी अदालत में उठा।
10 सितंबर को कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति तपोब्रत चक्रवर्ती ने इस स्थिति पर सीआईडी और राज्य सरकार से सवाल किए थे। अदालत ने पूछा था कि जब बीडीओ के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी है, तो जांच एजेंसी उन्हें तलाश क्यों नहीं कर पा रही है।
पहले मिली थी अग्रिम जमानत, बाद में हाई कोर्ट ने आदेश रद्द किया
स्वर्ण कारोबारी की हत्या के मामले में प्रशांत बर्मन को बारासात और विधाननगर की निचली अदालतों से अग्रिम जमानत मिली थी। विधाननगर पुलिस ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
इसके बाद हाई कोर्ट ने अग्रिम जमानत का आदेश रद्द करते हुए प्रशांत को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। 23 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें सरेंडर करने को कहा था। लेकिन इन निर्देशों के बावजूद वह पुलिस की पकड़ से बाहर रहे।
सड़क हादसे में गिरफ्तारी के बाद भी मिल गई थी जमानत
मामले में 25 मई को एक और घटनाक्रम सामने आया था। आरोप है कि न्यू टाउन के इको पार्क थाना क्षेत्र में प्रशांत की कार ने एक राहगीर को टक्कर मार दी थी। मौके पर पहुंची पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
अगले दिन उन्हें बारासात अदालत में पेश किया गया। सुनवाई के दौरान संबंधित हत्या के मामले के दस्तावेज समय पर अदालत में नहीं पहुंच सके। बताया गया कि मजिस्ट्रेट ने 26 मई की शाम तक दस्तावेजों का इंतजार किया था। आवश्यक कागजात नहीं पहुंचने के बाद प्रशांत को जमानत मिल गई और वह घर चले गए।
इसके बाद से वह फिर पुलिस की पहुंच से बाहर बताए जा रहे हैं।
अब राज्य सरकार की कार्रवाई पर नजर
प्रशांत बर्मन के आत्मसमर्पण नहीं करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब राज्य सरकार और जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने पर जोर दिया है।































