कोलकाता : कोलकाता की दुर्गापूजा की सबसे बड़ी विशेषता यहां की रचनात्मकता है। पूजा समितियां हर साल नए विषयों, अनूठी सजावट और कलात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। कहीं ग्रामीण बंगाल की लोककला दिखाई देती है, तो कहीं ऐतिहासिक धरोहर, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक संदेश और आधुनिक स्थापत्य से प्रेरित पंडाल दर्शकों को आकर्षित करते हैं।
उत्तर कोलकाता की कई पारंपरिक पूजाओं में पुराने रीति-रिवाजों, पारिवारिक परंपराओं और शास्त्रीय प्रतिमा शैली की झलक मिलती है। दूसरी ओर, दक्षिण और पूर्वी कोलकाता के अनेक पूजा पंडाल अपनी भव्य सजावट, रोशनी और नए प्रयोगों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन सबके बीच मां दुर्गा की प्रतिमा और महिषासुर पर विजय की कथा उत्सव का धार्मिक केंद्र बनी रहती है।
पंडालों में उमड़ती भीड़, सुरक्षा पर विशेष ध्यान
दुर्गापूजा के दिनों में महानगर के प्रमुख पूजा पंडालों और बाजारों में भारी भीड़ उमड़ती है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी की रातों में पंडाल दर्शन के लिए लोगों की आवाजाही और बढ़ जाती है। ऐसे में भीड़ प्रबंधन, यातायात नियंत्रण, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा तथा आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

पुलिस और संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों की ओर से पूजा के दौरान यातायात व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा इंतजामों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। प्रमुख सड़कों पर वाहनों की आवाजाही में बदलाव, पैदल यात्रियों के लिए निर्धारित मार्ग और संवेदनशील स्थानों पर निगरानी जैसे उपाय लोगों की सुविधा के लिए अहम होते हैं। पंडाल घूमने वालों को भी प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए और बच्चों को भीड़ में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।
2026 के खास थीम पंडाल बने आकर्षण
इस साल की पूजा में परंपरा के साथ नए प्रयोग भी देखने को मिल रहे हैं।
कुछ पंडालों में जलाशयों के संरक्षण, प्राचीन समुद्री व्यापार और लुप्त होती कठपुतली कला जैसे विषयों को कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। दमदम पार्क तरुण संघ की प्रस्तुति में समुद्री व्यापार का इतिहास, जबकि दमदम पार्क सार्वजनिक पूजा में कठपुतली कला को प्रमुखता दी गई है
उत्तर कोलकाता के अहिरीटोला में बंगाल की मिठाइयों की विरासत और पुराने कोलकाता की संस्कृति को केंद्र में रखने की पहल भी चर्चा में है। ऐसे विषय आधारित पंडाल दुर्गापूजा को केवल प्रतिमा दर्शन तक सीमित नहीं रखते, बल्कि दर्शकों को कला, इतिहास और सामाजिक सरोकारों से भी जोड़ते हैं।
मेट्रो और विशेष ट्रेनों से मिलेगी राहत
पूजा के दौरान लाखों लोगों की आवाजाही को देखते हुए मेट्रो और रेलवे ने विशेष सेवाओं की व्यवस्था की है। घोषित कार्यक्रम के अनुसार, ब्लू और ग्रीन मेट्रो लाइनों पर सप्तमी से नवमी के दौरान रातभर सेवाएं उपलब्ध कराने की योजना है। इससे देर रात तक पंडाल घूमने वाले लोगों को आवागमन में सुविधा मिलने की उम्मीद है। यात्रियों को निकलने से पहले संबंधित लाइन की समय-सारणी और अंतिम ट्रेन का समय जांचने की सलाह दी गई है।
कोलकाता पुलिस ने भी पंडाल घूमने वालों के लिए यातायात मार्गदर्शिका जारी की है। इसमें प्रमुख पंडालों तक पहुंचने के रास्ते, प्रवेश और प्रतिबंधित मार्ग, नजदीकी मेट्रो स्टेशन तथा आपातकालीन हेल्पलाइन की जानकारी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, यातायात व्यवस्था संभालने के लिए लगभग 6,000 यातायात कर्मियों के साथ होमगार्ड और नागरिक स्वयंसेवकों की तैनाती की योजना बनाई गई है।
बाजारों में रौनक, कारोबार को सहारा

दुर्गापूजा का असर धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देता है। कपड़ों, जूतों, आभूषणों, उपहारों और सजावटी सामान की दुकानों में खरीदारी बढ़ती है। पंडालों के आसपास खाने-पीने के अस्थायी स्टॉल, परिवहन सेवाएं, रोशनी और सजावट से जुड़े कामगार भी इस उत्सव से रोजगार पाते हैं।
कोलकाता की पहचान माने जाने वाले रोल, चॉप और दूसरे लोकप्रिय व्यंजन पंडाल घूमने के अनुभव का अहम हिस्सा हैं। हालांकि, रसोई गैस और खाद्य सामग्री की बढ़ती लागत के कारण इस बार कुछ खाद्य विक्रेताओं के सामने कीमतों और मुनाफे को लेकर चुनौती भी है।
आस्था, एकता और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान
दुर्गापूजा का वास्तविक महत्व उसकी भव्यता से आगे बढ़कर लोगों को जोड़ने में है। पूजा समितियां, कलाकार, कारीगर, स्वयंसेवक और स्थानीय निवासी मिलकर इस उत्सव को सफल बनाते हैं। मां दुर्गा के आगमन का उत्साह परिवारों और समुदायों को एक साथ लाता है।
2026 की कोलकाता दुर्गापूजा में भी परंपरा, आधुनिक कला, तकनीक और जनभागीदारी का संगम दिखाई दे रहा है। भव्य पंडालों और रोशनी के बीच इस उत्सव की सबसे बड़ी पहचान वही है—आस्था, आनंद और अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का साझा संकल्प।































