कोलकाता: पश्चिम बंगाल में निजी अस्पतालों को इंडस्ट्री बना दिया गया है। यह आरोप है आम लोगों के। पेशेंट को कस्टमर समझ कर अस्पताल पेश आने लगे हैं।बड़े अस्पतालों के परिचित डॉक्टर दबी जुबान से कहते हैं कि यहाँ डॉक्टर के रूप में कुछ और बैठे हैं। गंभीर बीमारी होने पर अगर किसी बड़े अस्पताल में जाने पर वे यह आंकते हैं की यह पेसेंट पार्टी कितनी औक़ात रखता है। यानी कितना का बिल यह वहन कर सकता है।
हाल में एक बच्चे को पीडियाट्रिक परेशानी हुई थी। उसके परिजन एक बड़े अस्पताल में गए थे। संयोग से डॉक्टर परिचित थे। उन्होंने साफ़ कहा की यहाँ के डॉक्टर से मत दिखाइए। आप या तो एम्स दिल्ली चले जाइए या फिर दक्षिण भारत के किसी अस्पताल में। लेकिन यहाँ चिकत्सा मत करवाइए। बच्चे का सवाल है। यह एक उदाहरण है।
एक और घटना में एक बड़े अस्पताल में प्रिस्क्रिप्शन पर कुछ और लिखा था लेकिन मेडिकल का सामान कुछ और लगाया गया और पैसे स्टैण्डर्ड सामान का ले लिया गया। जब पेशेंट पार्टी ने सवाल उठाये तो आरोप है कि डॉक्टर साहब गाली गलौज पर उतर आए। अब वह परिवार कानूनी करवाई की सोच रहा है।
बड़े अस्पतालों का फंडा यह है की फाइव स्टार जैसी सुविधा रहने के लिए दो लेकिन चिकित्सा में वह बात नहीं रहती। हम यहाँ बता देना चाहते हैं की ऐसा हर अस्पताल के साथ नहीं है लेकिन जो अपने को बड़ा अस्पताल होने का दावा करते है वहाँ चिकित्सा कॉर्पोरेट हो गई है। इस मुद्दे को हम आवाज उठायेंगे। उठाते रहेंगे। आपका साथ चाहिए । सरकार से भी अनुरोध है की निजी अस्पतालों पर अंकुश लगाने का प्रयास जरूर करे । डाक्टरों की मनमानी बंद होनी चाहिए।






























