रात में बिगड़ी तबीयत, अस्पताल में बचाने की कोशिश
मुंबई/पणजी। भारतीय सिनेमा के दमदार कलाकारों में शुमार नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित उनके आवास पर तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर सामने आते ही बॉलीवुड और मराठी फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
नाना पाटेकर अपनी बेबाक अदाकारी, दमदार संवाद अदायगी और चेहरे के भावों से किरदार में जान डाल देने की कला के लिए जाने जाते थे। उन्होंने पर्दे पर सिर्फ किरदार नहीं निभाए, बल्कि अपनी अलग शैली से उन्हें यादगार बना दिया।
रिपोर्टों के मुताबिक, देर रात नाना पाटेकर ने एक मित्र को अपनी तबीयत खराब होने और सीने में दर्द की शिकायत की थी। इसके बाद उन्हें गोवा के अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों की टीम ने काफी देर तक CPR देकर उनकी जान बचाने की कोशिश की, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उनका निधन हो गया।
उनकी मौत के बाद मेडिकल और कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं। मृत्यु के सटीक चिकित्सकीय कारण की अंतिम पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद होगी।
‘क्रांतिवीर’ से ‘वेलकम’ तक—हर किरदार पर छोड़ी छाप
नाना पाटेकर का फिल्मी सफर कई दशकों तक फैला रहा। ‘परिंदा’, ‘प्रहार’, ‘क्रांतिवीर’, ‘तिरंगा’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाकर दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी।
गंभीर भूमिकाओं से लेकर कॉमेडी तक, नाना ने हर किरदार को अपनी खास शैली दी। उनके संवाद बोलने का अंदाज और अभिनय की तीव्रता उनकी पहचान बन गई।
अभिनय ही नहीं, सामाजिक काम में भी आगे
नाना पाटेकर सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे। किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने सक्रियता दिखाई और नाम फाउंडेशन के माध्यम से किसानों तथा जरूरतमंद परिवारों की मदद के लिए काम किया।
उनका व्यक्तित्व सिर्फ रुपहले पर्दे तक सीमित नहीं था। सामाजिक सरोकारों पर उनकी बेबाक राय और जरूरतमंदों की मदद के प्रयासों ने उन्हें एक अलग पहचान दी।
राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित
नाना पाटेकर को उनके शानदार अभिनय के लिए कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
उनका जाना भारतीय सिनेमा के उस दौर का भी अंत है, जिसमें कलाकार अपने संवाद, अभिनय और व्यक्तित्व से पूरी फिल्म को अपने प्रभाव में ले लेते थे।
एक कलाकार नहीं, अपने आप में एक संस्था थे नाना
नाना पाटेकर का अभिनय पर्दे पर आते ही अलग ऊर्जा पैदा करता था। उनकी आवाज, संवाद बोलने का अंदाज और भाव-भंगिमा दर्शकों को बांध लेती थी।
नाना पाटेकर का निधन सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा की एक ऐसी आवाज का खामोश हो जाना है, जिसे पर्दे पर आते ही पहचान लिया जाता था।
उनकी फिल्में, उनके किरदार और उनके संवाद लंबे समय तक दर्शकों की स्मृतियों में जीवित रहेंगे।






























