क्या आपको भी रात में आते हैं पैरों में क्रैम्प्स ?
…तो आपको हो सकती है यह बीमारी
वेरिकोस वेन्स (Varicose Veins) पैरों की नसों से जुड़ी एक आम लेकिन अक्सर नज़रअंदाज़ की जाने वाली बीमारी है। इस स्थिति में पैरों की नसें सूजकर उभर आती हैं और टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देने लगती हैं। यह केवल सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर जटिलताएँ भी पैदा कर सकती है।
वेरिकोस वेन्स क्या है?
डॉ. अबीर भट्टाचार्य, हेड – रेडियोलॉजी एंड इंटरवेंशन, सी के बिरला ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स, कहते हैं
‘हमारे पैरों की नसों में छोटे-छोटे वाल्व होते हैं, जो खून को नीचे से ऊपर यानी हृदय की ओर भेजने में मदद करते हैं। जब ये वाल्व कमजोर या क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, तो खून सही दिशा में नहीं जा पाता और नसों में ही जमा होने लगता है।
इससे नसें फूल जाती हैं, ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है और आसपास के टिश्यू, स्किन, मसल्स और हड्डियों तक पर्याप्त पोषण नहीं पहुंच पाता।‘
क्यों होती है यह बीमारी?
वेरिकोस वेन्स के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- लंबे समय तक खड़े रहना – जैसे होममेकर, हॉकर्स, ट्रैफिक पुलिस, शिक्षक आदि
- हेरेडिटरी (अनुवांशिक कारण)
- महिलाओं में अधिक जोखिम, खासकर प्रेग्नेंसी के बाद
- मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता
- उम्र बढ़ना
अनुमान है कि 100 में से लगभग 25–30 प्रतिशत लोगों में किसी न किसी स्तर पर यह समस्या देखी जा सकती है।
शुरुआती लक्षण क्या हैं?
अक्सर लोग शुरुआती संकेतों को सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ध्यान देने योग्य लक्षण:
- पैरों की नसों का उभरना या फूलना
- पैरों में भारीपन या दर्द
- रात में बार-बार क्रैम्प (ऐंठन) आना
- त्वचा में खुजली या जलन
- टखनों में सूजन
- देर रात तक दर्द का बढ़ जाना, जबकि सुबह अपेक्षाकृत आराम
कई लोग नाइट क्रैम्प्स होने पर ORS या पानी लेना शुरू कर देते हैं, लेकिन यदि यह समस्या बार-बार हो रही है, तो जांच जरूरी है।
बीमारी बढ़ने पर क्या हो सकता है?
अगर समय पर इलाज न किया जाए, तो:
- त्वचा का रंग बदल सकता है
- स्किन डैमेज हो सकता है
- पैरों में घाव (अल्सर) बन सकते हैं
- ब्लीडिंग हो सकती है, जिसका पता भी देर से चलता है
साड़ी या फुल पैंट पहनने के कारण नसें अक्सर दिखाई नहीं देतीं, इसलिए कई मरीज देर से डॉक्टर के पास पहुंचते हैं।
जांच कैसे होती है?
फिजिकल एग्जामिनेशन के बाद डॉक्टर एक विशेष जांच करवाते हैं जिसे कलर डॉप्लर टेस्ट कहा जाता है।
इससे पता चलता है:
- नसों में ब्लड फ्लो की स्थिति
- वाल्व की कार्यक्षमता
- बीमारी की गंभीरता
यह जांच पूरी तरह सुरक्षित और दर्दरहित होती है।
इलाज के आधुनिक विकल्प
पहले वेरिकोस वेन्स के इलाज में सर्जरी करके नस को काटकर निकाल दिया जाता था। इसमें रिकवरी में समय लगता था और बीमारी दोबारा होने की संभावना भी रहती थी।
अब इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी की मदद से आधुनिक, कम दर्द वाली तकनीकें उपलब्ध हैं:
1. लेजर ट्रीटमेंट
नस के अंदर लेजर फाइबर डालकर उसे अंदर से बंद किया जाता है।
2. माइक्रोवेव एब्लेशन
गर्मी की सहायता से नस को सील किया जाता है।
3. मेडिकल ग्लू (Glue Therapy)
विशेष गोंद के जरिए नस को बंद किया जाता है, जिससे खून दूसरी स्वस्थ नसों से बहने लगता है।
इन प्रक्रियाओं में:
- केवल एक छोटा सा नीडल पिक किया जाता है
- लोकल एनेस्थीसिया दिया जाता है
- लगभग एक घंटे में प्रक्रिया पूरी हो जाती है
- मरीज उसी दिन चलने लग जाता है
- सफलता दर पहले की तुलना में काफी अधिक है
कब जरूरी है इलाज?
जब बीमारी शुरुआती और रिवर्सेबल स्टेज में हो, तब इलाज कराना बेहद जरूरी है। सही समय पर उपचार से पूर्ण राहत संभव है। लेकिन लापरवाही गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है।
बचाव के उपाय
- लंबे समय तक लगातार खड़े न रहें
- हर 30–40 मिनट में थोड़ी वॉक करें
- पैरों को ऊंचाई पर रखकर आराम करें
- नियमित एक्सरसाइज करें
- डॉक्टर की सलाह से कंप्रेशन स्टॉकिंग्स पहनें
- वजन नियंत्रित रखें
महिलाओं में विशेष सावधानी
महिलाओं में यह समस्या अधिक देखी जाती है, खासकर गर्भावस्था के बाद। हार्मोनल बदलाव और बढ़ते वजन के कारण नसों पर दबाव बढ़ता है। इसलिए प्रेग्नेंसी के दौरान और बाद में पैरों की सूजन या नसों के उभरने को नजरअंदाज न करें।
निष्कर्ष
वेरिकोस वेन्स एक आम लेकिन गंभीर नसों की बीमारी है, जो समय पर पहचान और आधुनिक इंटरवेंशनल तकनीकों से पूरी तरह नियंत्रित और ठीक की जा सकती है।
यदि आपके पैरों में नसें उभर रही हैं, रात में क्रैम्प आते हैं या लगातार दर्द रहता है, तो इसे सामान्य थकान समझकर टालें नहीं। समय पर जांच और सही उपचार ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।
























