कोलकाता : पश्चिम बंगाल में बुधवार को विजयादशमी के अवसर पर मां दुर्गा की विदाई का भावुक दृश्य देखने को मिला। सुबह से ही पूजा पंडालों में ढाक की थाप के बीच विदाई की तैयारियां शुरू हो गईं। कहीं देवी वरण और सिंदूर खेला की परंपरा निभाई गई, तो कहीं श्रद्धालु नम आंखों से मां को विदा करने पहुंचे। दोपहर होते-होते कोलकाता समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रतिमा विसर्जन की तैयारियां तेज हो गईं।
पांच दिनों तक उत्सव, रोशनी और उल्लास में डूबा बंगाल अब मां दुर्गा को कैलाश विदा करने की तैयारी में जुटा है। मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा अपने बच्चों लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश के साथ धरती पर आती हैं और विजयादशमी पर अपने धाम लौट जाती हैं। इसके साथ ही शुरू हो जाता है अगले साल दुर्गापूजा का इंतजार।
सिंदूर खेला और देवी वरण के साथ मां को विदाई
विजयादशमी की सुबह से ही राज्य के कई पूजा पंडालों में देवी वरण और सिंदूर खेला का आयोजन शुरू हो गया। परंपरा के अनुसार, महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर सुख, समृद्धि और सौभाग्य की कामना की। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर विजयादशमी की शुभकामनाएं दीं।
कोलकाता के विभिन्न पूजा पंडालों में भी दोपहर के बाद श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी। ढाक की थाप, पारंपरिक नृत्य और विदाई के गीतों के बीच उत्सव का माहौल भावुक होता गया। देवी वरण के बाद प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए घाटों तक ले जाने की तैयारी की गई।
दक्षिण 24 परगना के पुराने घरों में दिखी परंपरा की झलक
दक्षिण 24 परगना जिले के पारंपरिक और पुराने जमींदार परिवारों में विजयादशमी का उत्सव खास अंदाज में मनाया गया। बारुईपुर, जयनगर, मथुरापुर और डायमंड हार्बर के आसपास स्थित कई पुराने घरों में सुबह से ही देवी वरण और सिंदूर खेला की रस्में निभाई गईं।
इन परिवारों की दुर्गापूजा में पुरानी परंपराओं और पारिवारिक विरासत का विशेष महत्व है। विजयादशमी पर परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों की भागीदारी से उत्सव का माहौल बना रहा। वहीं, सार्वजनिक पूजा पंडालों में भी दोपहर के बाद भीड़ बढ़ने लगी और सिंदूर खेला के साथ मां को विदाई देने का सिलसिला जारी रहा।
उत्तर बंगाल में भी देवी वरण, सिलीगुड़ी से कूचबिहार तक उत्सव
दुर्गा प्रतिमा की विदाई का दृश्य केवल कोलकाता और दक्षिण बंगाल तक सीमित नहीं रहा। उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार और कूचबिहार में भी पूजा पंडालों में देवी वरण और सिंदूर खेला का आयोजन हुआ।
स्थानीय पूजा समितियों और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विजयादशमी मनाई। उत्सव के अंतिम दिन पंडालों में लोगों की आवाजाही जारी रही और विसर्जन के लिए तैयारियां की गईं।
जंगलमहल के रायपुर में महामाया मंदिर की अनोखी परंपरा
बांकुड़ा जिले के जंगलमहल क्षेत्र के रायपुर स्थित चांदुडांगा गांव में मां महामाया मंदिर की दुर्गापूजा की एक विशिष्ट परंपरा देखने को मिली। यहां विजयादशमी की पूजा संपन्न होने के बाद आलम सायर तालाब में घट विसर्जन किया गया।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसी तालाब में मां महामाया ने एक छोटी बच्ची के रूप में एक शंख विक्रेता से शंख की चूड़ियां पहनी थीं। परंपरा के तहत सप्तमी की सुबह इसी तालाब से घट लाकर नवपत्रिका स्नान सहित पूजा की रस्में पूरी की जाती हैं। वहीं, दशमी की पूजा के बाद उसी तालाब में घट विसर्जित किया जाता है।
इस अवसर पर कई श्रद्धालु विसर्जन घाट पर आंचल फैलाकर बैठते हैं और मां महामाया का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। यह परंपरा स्थानीय आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं का प्रतीक मानी जाती है।
इछामती नदी में दोनों बंगाल की प्रतिमाओं का विसर्जन
उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट स्थित इछामती नदी में भी प्रतिमा विसर्जन शुरू हो गया। यह नदी भारत और बांग्लादेश के बीच बहती है और यहां दोनों ओर की दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा रही है।
विसर्जन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग नदी के किनारे पहुंचे। इस दौरान प्रशासन की ओर से सुरक्षा के इंतजाम किए गए, ताकि श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और विसर्जन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो।
विदाई के साथ अगले साल का इंतजार
विजयादशमी के साथ बंगाल के सबसे बड़े त्योहार का समापन शुरू हो गया है। जिन गलियों और पंडालों में कुछ दिन पहले तक रोशनी, संगीत और उत्साह का माहौल था, वहां अब मां दुर्गा की विदाई की तैयारी है।
ढाक की थाप के बीच श्रद्धालु मां से सुख-समृद्धि और मंगल की कामना कर रहे हैं। प्रतिमा विसर्जन के साथ उत्सव भले ही समाप्त हो जाए, लेकिन मां के अगले आगमन की प्रतीक्षा अभी से शुरू हो गई है।































