महाराष्ट्र से सप्लाई घटने और अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की कमी का असर; अक्टूबर से पहले राहत की उम्मीद कम
कोलकाता : प्याज की बढ़ती कीमत ने आम लोगों की रसोई का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। कोलकाता के बाजारों में प्याज का खुदरा भाव करीब 60 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गया है। कारोबारियों का कहना है कि अगर थोक बाजार में कीमतों का यही रुख जारी रहा, तो आने वाले दिनों में प्याज 70 से 80 रुपये किलो तक पहुंच सकता है।
एक खुदरा विक्रेता ने बताया कि पिछले साल इसी समय वह करीब 30 रुपये किलो की दर से प्याज बेच रहा था। इस साल कीमत लगभग दोगुनी हो गई है। उसका कहना है, “जब थोक बाजार में ही कीमत इतनी अधिक है, तो खुदरा विक्रेता भी क्या कर सकता है?”
प्याज कारोबारियों के मुताबिक पोस्ता और कोले बाजार के थोक बाजार में भी कीमतों को लेकर दबाव बना हुआ है। कारोबारियों का अनुमान है कि अगर आने वाले कुछ दिनों में कीमत 70-80 रुपये किलो तक पहुंचती है, तो यह आश्चर्य की बात नहीं होगी।
जमाखोरी से लेकर सप्लाई की कमी तक, कई वजहें
प्याज की कीमतों में और बढ़ोतरी की आशंका के बीच कुछ कारोबारियों ने अपने पास मौजूद स्टॉक की बाजार में आपूर्ति कम कर दी है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय कृषि सचिव नितिन खार्गे ने भी कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे जमाखोरी को एक वजह बताया है।
हालांकि, कारोबारियों और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगस्त-सितंबर के दौरान प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी कोई नई बात नहीं है। त्योहारों के मौसम से पहले मांग और सप्लाई के बीच अंतर बढ़ने से अक्सर कीमतों पर दबाव आता है।
दूसरे राज्यों पर निर्भर है बंगाल
प्याज के मामले में पश्चिम बंगाल काफी हद तक दूसरे राज्यों पर निर्भर है। राज्य में आमतौर पर दिसंबर में प्याज की बुआई होती है और फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में फसल तैयार होती है। बंगाल में उत्पादित प्याज अप्रैल से जुलाई के बीच बाजार में उपलब्ध रहता है।
जुलाई के बाद राज्य की प्याज की जरूरत मुख्य रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से आने वाली सप्लाई से पूरी होती है। फिलहाल इन्हीं राज्यों से आने वाली सप्लाई में कमी और ऊंची कीमतों का असर बंगाल के बाजार पर दिखाई दे रहा है।
नासिक से सप्लाई घटी, ईंधन महंगा होने से बढ़ी लागत
कारोबारियों के अनुसार महाराष्ट्र के नासिक से प्याज की सप्लाई कम हुई है। इसके अलावा ईंधन की बढ़ती लागत ने परिवहन खर्च बढ़ा दिया है, जिसका सीधा असर प्याज की कीमत पर पड़ रहा है।
आंध्र प्रदेश और बेंगलुरु से आने वाले प्याज की कीमत करीब 1,900 रुपये प्रति मन (40 किलो) बताई जा रही है, जबकि नासिक के प्याज का भाव करीब 2,000 रुपये प्रति मन है। महाराष्ट्र के स्थानीय बाजारों में भी प्याज की कीमत 50 से 52 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।
देश में हर महीने 17 लाख टन प्याज की जरूरत
भारत में हर महीने करीब 17 लाख मीट्रिक टन प्याज की खपत होती है। सालभर मांग में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आता, लेकिन सप्लाई में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर कीमतों पर पड़ता है।
देश में प्याज की उपलब्धता काफी हद तक रबी सीजन की फसल पर निर्भर करती है। यह फसल मई-जून से अक्टूबर-नवंबर तक बाजार की जरूरत पूरी करने में अहम भूमिका निभाती है। रबी प्याज को लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है। ऐसे में स्टॉक और बाजार में उसकी आपूर्ति कीमतों को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक बन जाती है।
उत्पादन में बड़ी कमी नहीं, असली परेशानी गुणवत्ता की
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल देश में प्याज का उत्पादन करीब 30.737 मिलियन मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। यह पिछले साल के मुकाबले लगभग 30 हजार मीट्रिक टन कम है, लेकिन कुल उत्पादन घरेलू मांग पूरी करने और करीब 1.5 मिलियन मीट्रिक टन निर्यात के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।
ऐसे में समस्या उत्पादन की भारी कमी से ज्यादा अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की उपलब्धता को लेकर है।
महाराष्ट्र देश में प्याज उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है और देश के कुल उत्पादन का करीब 40 फीसदी हिस्सा इसी राज्य से आता है। खासकर नासिक क्षेत्र प्याज उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।
इस साल महाराष्ट्र में मौसम के उतार-चढ़ाव ने भी फसल की गुणवत्ता को प्रभावित किया। अप्रैल में बेमौसम बारिश, उसके बाद मानसून की शुरुआत में देरी और फिर भारी बारिश के कारण खेती प्रभावित हुई। इसका असर अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की उपलब्धता पर पड़ा है। कारोबारियों का मानना है कि कीमतों में मौजूदा तेजी की यह भी एक बड़ी वजह है।
अक्टूबर से पहले राहत की उम्मीद कम
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल प्याज की कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना कम है। बाजार में महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से जो प्याज पहुंच रहा है, वह मुख्य रूप से पिछली सर्दियों की फसल है।
मानसून सीजन की नई फसल बाजार में आने में अभी करीब एक से डेढ़ महीने का समय लग सकता है। सबसे पहले कर्नाटक की नई फसल बाजार में आने की उम्मीद है। इसके बाद ही सप्लाई बढ़ने और कीमतों में कुछ राहत मिलने की संभावना है।






























