हिमालयी क्षेत्र अपनी भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण भूस्खलन, बादल फटने, अचानक बाढ़ और ग्लेशियल झीलों के फटने जैसी आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऊंचे पर्वतीय इलाकों में तेजी से बदलता मौसम, भारी बारिश, ग्लेशियरों का पिघलना और पहाड़ी ढलानों का कमजोर होना कई बार अचानक बड़े हादसों की वजह बन जाता है।
पिछले कुछ दशकों में उत्तराखंड, सिक्किम, नेपाल और हिमालय से लगे अन्य इलाकों में ऐसी कई प्राकृतिक आपदाएं सामने आई हैं, जिन्होंने बड़े पैमाने पर जनजीवन और बुनियादी ढांचे को प्रभावित किया।
केदारनाथ आपदा 2013: उत्तराखंड में मची भारी तबाही
जून 2013 में उत्तराखंड में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन को देश की सबसे भीषण पर्वतीय आपदाओं में गिना जाता है। केदारनाथ और आसपास के इलाकों में भारी बारिश तथा जलप्रलय ने व्यापक नुकसान पहुंचाया। इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और सड़क, पुल तथा पैदल मार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। केदारनाथ क्षेत्र में आई तबाही ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
चमोली आपदा 2021: ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक सैलाब
फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली जिले में एक बड़ी प्राकृतिक आपदा हुई। ग्लेशियर से जुड़ी घटना के बाद ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों में अचानक तेज बहाव आया। इससे नदी घाटी में भारी नुकसान हुआ और जलविद्युत परियोजनाएं भी प्रभावित हुईं। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और पर्वतीय नदियों से जुड़े जोखिम को एक बार फिर सामने ला दिया।
मेलमची बाढ़ 2021: नेपाल में भारी बारिश से तबाही
नेपाल में 2021 के दौरान मेलमची क्षेत्र में भारी बारिश और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं के बीच अचानक बाढ़ की स्थिति बनी। मेलमची नदी में तेज बहाव के कारण आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा और कई परिवार प्रभावित हुए।
मोतेकोशी बाढ़ 2016: तिब्बत-नेपाल सीमा क्षेत्र में सैलाब
2016 में तिब्बत-नेपाल सीमा के पास मोतेकोशी नदी क्षेत्र में अचानक बाढ़ की घटना सामने आई। ग्लेशियल झील से जुड़े प्राकृतिक बदलाव के बाद नदी में अचानक पानी बढ़ने से निचले इलाकों पर असर पड़ा। इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों और प्राकृतिक जल स्रोतों में होने वाले बदलाव का असर कई किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है।
पेरू ग्लेशियर आपदा 1970: दुनिया की बड़ी पर्वतीय त्रासदियों में से एक
1970 में पेरू में आए शक्तिशाली भूकंप के बाद हिमालय से बाहर एक बेहद विनाशकारी ग्लेशियल आपदा हुई। भूकंप के कारण पर्वतीय क्षेत्र का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया और बर्फ, पानी तथा मलबे के साथ विशाल सैलाब पैदा हुआ। इस आपदा में हजारों लोगों की मौत हुई और युंगाय शहर में भारी तबाही हुई। यह घटना दुनिया की सबसे भयावह ग्लेशियल आपदाओं में गिनी जाती है।
दक्षिण ल्होनक झील, सिक्किम 2023: फिर सामने आया GLOF का खतरा
अक्टूबर 2023 में सिक्किम में दक्षिण ल्होनक झील से जुड़ी ग्लेशियल झील बाढ़ यानी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) की घटना ने भारी तबाही मचाई। अचानक आए तेज जलप्रवाह ने तीस्ता नदी घाटी में व्यापक नुकसान किया। सड़कें, पुल और कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे प्रभावित हुए। इस घटना ने हिमालयी ग्लेशियल झीलों की बढ़ती संवेदनशीलता को लेकर गंभीर चिंता पैदा की।
ग्लेशियल झील फटने की घटना क्या होती है?
ग्लेशियरों के पीछे या आसपास पिघले पानी से बड़ी झीलें बन सकती हैं। इन झीलों को ग्लेशियल झील कहा जाता है। यदि प्राकृतिक बर्फ, मलबे या चट्टानों से बना बांध अचानक टूट जाए, तो झील का विशाल जलराशि बहुत तेज गति से नीचे की ओर बह सकती है।
इसे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है।
ऐसी बाढ़ कुछ ही समय में नदी घाटी में भारी तबाही मचा सकती है। तेज बहाव अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और मलबा लेकर नीचे आता है, जिससे पुल, सड़कें, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही है चुनौती
हिमालय में बढ़ती प्राकृतिक अस्थिरता के बीच ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। मौसम में अचानक बदलाव, अत्यधिक बारिश, ग्लेशियरों के पिघलने और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते निर्माण से आपदा का जोखिम कई जगह और जटिल हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियल झीलों की नियमित निगरानी, बेहतर मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
निष्कर्ष
केदारनाथ से लेकर चमोली, नेपाल के मेलमची और सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील तक की घटनाएं बताती हैं कि हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। ग्लेशियल झीलों का बढ़ता खतरा और अचानक आने वाली बाढ़ भविष्य में भी बड़ी चुनौती बन सकती है।
इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन, वैज्ञानिक निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था को प्राथमिकता देना जरूरी है।






























