फिर की ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग
नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। गुरुवार को दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ममता ने कहा कि 2029 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है और उससे पहले ही ‘खुशखबरी’ आ सकती है। उनके बयान को केंद्र की भाजपा सरकार को लेकर राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, उन्होंने भविष्य की किसी राजनीतिक घटना की निश्चित घोषणा नहीं की।
ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी दिल्ली में विपक्षी INDIA गठबंधन की बैठकों में शामिल होने पहुंचे हैं। हाल में चुनाव आयोग के भीतर मतदाता सूची और SIR से जुड़े मुद्दों पर कथित मतभेदों को लेकर रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज की है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा पिछले 10 महीनों में कई फैसलों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की बात कही गई थी। चुनाव आयोग ने जवाब में कहा है कि आयोग के सभी फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मत प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।
ममता ने 2023 के कानून पर भी उठाए सवाल
ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों से जुड़े 2023 के कानून पर भी सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून को संसद में पर्याप्त समर्थन के बिना पारित किया गया था और CEC को मिलने वाले कानूनी संरक्षण का विरोध किया।
ममता ने कहा कि इस तरह के संरक्षण के नाम पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने चुनाव आयोग की IT शाखा की वरिष्ठ अधिकारी सीमा खन्ना की नियुक्ति और चुनाव प्रक्रिया में उनकी भूमिका पर भी सवाल उठाए।
हालांकि, CEC को कानूनी संरक्षण से संबंधित प्रावधान और उसके प्रभाव को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हैं। विपक्षी INDIA गठबंधन इस मुद्दे पर आगे कानूनी और राजनीतिक कार्रवाई की बात कर रहा है।
अभिषेक ने 150 सीटों को लेकर किया दावा
अभिषेक बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा है कि राज्य की कम से कम 150 विधानसभा सीटों पर SIR के कारण हटाए गए नामों की संख्या संबंधित भाजपा उम्मीदवार की जीत के अंतर से अधिक है।
उन्होंने अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में हटाए गए नामों और चुनावी जीत के अंतर से जुड़े आंकड़े भी पेश किए। अभिषेक ने यह भी आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में Form 6 के माध्यम से बड़ी संख्या में नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए और इनमें कुछ मतदाताओं को दूसरे राज्यों से पश्चिम बंगाल लाए जाने का दावा किया गया।
हालांकि, इन आरोपों को चुनाव आयोग की ओर से स्थापित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। SIR को लेकर आयोग का कहना है कि प्रक्रिया चुनावी सूची को अपडेट करने और पात्र मतदाताओं को शामिल करने के उद्देश्य से की जा रही है।
‘100 सीटों की CCTV फुटेज जारी करें’
अभिषेक बनर्जी ने चुनाव में कथित अनियमितताओं के आरोपों को लेकर चुनाव आयोग को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि वह 100 मतदान केंद्रों के नाम देने को तैयार हैं और दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक की CCTV फुटेज सार्वजनिक की जाए।
उनका आरोप है कि कुछ मतदान केंद्रों पर तृणमूल कांग्रेस के एजेंटों के साथ मारपीट की गई और मतदान प्रक्रिया में धांधली हुई। इन आरोपों के समर्थन में फुटेज सार्वजनिक करने की मांग उन्होंने पहले भी उठाई थी।
ममता बनर्जी ने भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए भी चुनावी प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ मारपीट की गई, मतदान केंद्र के दरवाजे बंद कर दिए गए और EVM में छेड़छाड़ हुई। ये सभी दावे ममता बनर्जी के राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
‘2029 तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा ‘ खुशखबरी ’
ममता ने कहा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद उनकी पार्टी के कई नेताओं ने उनका साथ छोड़कर विपक्षी खेमे का रुख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके करीबी नेताओं पर पुलिस का दबाव बनाया जा रहा है और उन्हें विरोधी खेमे में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
इसी संदर्भ में ममता ने कहा कि 2029 तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा और ‘खेल शुरू हो गया है’। उन्होंने जल्द ‘खुशखबरी’ आने का दावा किया।
ममता ने एक बार फिर कहा कि ज्ञानेश कुमार को पद छोड़ना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि वह खुद पद से हटते हैं तो उनकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी, जबकि पद पर बने रहने की स्थिति में आगे कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट के बाद बढ़ा विवाद
हाल में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार विभिन्न मुद्दों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें नए मतदाताओं को जोड़ने, SIR के दौरान नाम हटाने और मतदाता डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
इसके बाद विपक्षी दलों ने CEC के खिलाफ कार्रवाई और उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कहा कि अलग-अलग सुझाव या टिप्पणियां किसी भी संस्थान की निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और पिछले एक वर्ष में आयोग के फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।






















