सिर्फ प्रशिक्षण बढ़ाने से नहीं बदलेगी तस्वीर, समय, दूरी और सही जानकारी तक पहुंच को महिलाओं की जरूरतों के मुताबिक बनाने पर जोर जरूरी
भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर पिछले कई वर्षों से लगभग 32 से 33 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है, जबकि पुरुषों के लिए यह दर करीब 77 प्रतिशत है। आर्थिक समकक्ष देशों की तुलना में भारत की स्थिति इस मामले में अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। नीति आयोग के एक हालिया विश्लेषण ने इस तस्वीर की एक और अहम परत सामने रखी है। इसके मुताबिक, 71 प्रतिशत महिलाएं या तो अनौपचारिक रोजगार में हैं या ‘नीट’ श्रेणी में आती हैं, यानी न शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न ही प्रशिक्षण में। वहीं, केवल करीब 3 प्रतिशत महिलाएं औपचारिक नौकरियों में हैं।
डेलॉयट के ‘वीमेन एट वर्क’ शोध में भी महिलाओं के सामने मौजूद कुछ संरचनात्मक चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया गया है। इनमें अवैतनिक देखभाल कार्य का असमान बोझ और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं प्रमुख हैं। ये कारक न केवल महिलाओं के औपचारिक रोजगार में प्रवेश को प्रभावित करते हैं, बल्कि नौकरी में बने रहने की उनकी क्षमता पर भी असर डालते हैं। ब्लू और ग्रे कॉलर कार्यबल से जुड़े क्षेत्रीय आंकड़े भी महिलाओं की भागीदारी को करीब 19 प्रतिशत बताते हैं। साथ ही, वेतन, सुरक्षा और करियर में आगे बढ़ने के अवसरों में अंतर की स्थिति भी सामने आती है।
इन आंकड़ों को एक साथ देखने पर यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या महिलाओं की कम औपचारिक भागीदारी को केवल कौशल की कमी के नजरिए से देखा जाना चाहिए? पिछले एक दशक में भारत ने कौशल विकास के क्षेत्र में बड़े स्तर पर निवेश किया है। व्यावसायिक प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता और अलग-अलग क्षेत्रों के प्रमाणन कार्यक्रमों के जरिए करोड़ों महिलाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की गई है।
इसलिए अब चुनौती केवल यह नहीं है कि कितनी महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया, बल्कि यह है कि प्रशिक्षण के बाद कितनी महिलाएं औपचारिक और टिकाऊ रोजगार से जुड़ पा रही हैं।
प्रशिक्षण का समय भी है अहम
नीतिगत स्तर पर इस चुनौती को नए तरीके से देखने की जरूरत है। प्रशिक्षण की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि प्रशिक्षण का समय, स्थान और उसके बारे में मिलने वाली जानकारी महिलाओं की वास्तविक परिस्थितियों से कितनी मेल खाती है।
भारत में प्रचलित कई प्रशिक्षण मॉडल अब भी निश्चित और पूरे दिन चलने वाले प्रारूप पर आधारित हैं। यह व्यवस्था ऐसे प्रशिक्षणार्थियों को ध्यान में रखकर विकसित हुई थी, जिनके पास लंबे समय तक लगातार प्रशिक्षण लेने के लिए पर्याप्त समय हो। लेकिन आर्थिक गतिविधियों के साथ घर और देखभाल की जिम्मेदारियां संभालने वाली महिलाओं के लिए यह व्यवस्था हमेशा व्यावहारिक नहीं होती।
नीति आयोग की रिपोर्ट में उद्धृत सर्वेक्षण के अनुसार, 78 प्रतिशत महिलाएं ऐसा अंशकालिक प्रारूप पसंद करती हैं, जिसे देखभाल की जिम्मेदारियों के साथ संतुलित किया जा सके। वहीं 68 प्रतिशत महिलाएं पूर्णकालिक प्रशिक्षण की तुलना में अंशकालिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता देती हैं।
इससे संकेत मिलता है कि प्रशिक्षण को एक निश्चित और लंबे पाठ्यक्रम के बजाय छोटे-छोटे मॉड्यूल और चरणों में बांटना अधिक उपयोगी हो सकता है। इससे महिलाओं को अपनी उपलब्धता के अनुसार प्रशिक्षण पूरा करने का अवसर मिल सकता है।
पांच किलोमीटर के दायरे में हो प्रशिक्षण
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में प्रशिक्षण केंद्र की दूरी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सार्वजनिक प्रशिक्षण सुविधाओं का स्थान अक्सर जमीन की उपलब्धता और प्रशासनिक सुविधा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। लेकिन महिलाओं के लिए प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचने में दूरी के साथ-साथ परिवहन, रास्ते की सुरक्षा और परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार, 75 प्रतिशत महिलाएं अपने घर से पांच किलोमीटर के दायरे में प्रशिक्षण लेना पसंद करती हैं। यह आंकड़ा प्रशिक्षण केंद्रों की योजना बनाने के लिए एक व्यावहारिक संकेत दे सकता है।
ऐसे में स्वयं सहायता समूहों के महासंघ, आंगनवाड़ी नेटवर्क और सामुदायिक संसाधन केंद्रों जैसी मौजूदा स्थानीय संस्थाओं को प्रशिक्षण के अंतिम छोर तक पहुंचाने वाले केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे महिलाओं को दूर स्थित केंद्रीकृत संस्थानों तक जाने की जरूरत कम हो सकती है।
जानकारी की कमी भी बड़ी बाधा
महिलाओं के कौशल विकास में एक और महत्वपूर्ण चुनौती प्रशिक्षण के अवसरों की जानकारी तक पहुंच है। सार्वजनिक घोषणाएं, एसएमएस अभियान और डिजिटल विज्ञापन उन लोगों तक आसानी से पहुंच सकते हैं, जिनकी सूचना तक पहुंच पहले से बेहतर है। लेकिन समाज के कुछ हिस्सों में प्रशिक्षण की जानकारी हासिल करने के लिए खुद पूछताछ करना महिलाओं के लिए आसान नहीं होता।
नीति आयोग की रिपोर्ट में विजयवाड़ा के उपनगरीय क्षेत्र की एक महिला का उदाहरण दिया गया है, जिसे आसपास चल रहे कौशल कार्यक्रमों की जानकारी नहीं थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे एक कारण यह भी था कि उसके सामाजिक परिवेश में ऐसी जानकारी के लिए पूछताछ करना सहज नहीं माना जाता था।
ऐसी स्थिति में महिला नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूह और स्थानीय सामुदायिक संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ये समूह महिलाओं तक प्रशिक्षण से जुड़ी जानकारी पहुंचाने के साथ-साथ उनके सवालों और सामाजिक झिझक को दूर करने में भी मदद कर सकते हैं।
अब प्रशिक्षण से रोजगार तक पहुंच पर ध्यान
इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि भारत के कौशल विकास ढांचे को पूरी तरह बदलने की जरूरत जरूरी नहीं है। इसके बजाय समय, स्थान और सूचना के प्रसार के तरीके में लक्षित बदलाव किए जा सकते हैं।
32 से 33 प्रतिशत की महिला श्रम बल भागीदारी दर, 71 प्रतिशत महिलाओं का अनौपचारिक रोजगार या ‘नीट’ श्रेणी में होना और ब्लू-ग्रे कॉलर भूमिकाओं में करीब 19 प्रतिशत भागीदारी जैसे आंकड़े केवल समस्या के संकेत नहीं हैं। इन्हें यह समझने के आधार के रूप में भी देखा जा सकता है कि प्रशिक्षण और रोजगार के बीच मौजूद दूरी को कैसे कम किया जाए।
भारत में महिलाओं के कौशल विकास की अगली चुनौती शायद ‘कितनी महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया’ से आगे बढ़कर ‘कितनी महिलाएं प्रशिक्षण के बाद टिकाऊ और औपचारिक रोजगार से जुड़ीं’ पर केंद्रित होगी।
यदि प्रशिक्षण महिलाओं के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों—समय, दूरी, सुरक्षा और सूचना तक पहुंच—के अनुरूप बनाया जाता है, तो प्रशिक्षण से रोजगार तक पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ाने की संभावनाओं पर अधिक प्रभावी ढंग से काम किया जा सकता है।
लेखिका सुभश्री पति राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीवीईटी), कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के साथ कार्यरत हैं और इससे पहले नीति आयोग के साथ भी काम कर चुकी हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।































